Tuesday, August 28, 2018

डर के आगे जीत है

   

 ये कहानी एक सच्ची घटना पर आधारित है ;

     एक बार की बात है जब मै कक्षा 6 में पढ़ रहा था  और मेरी रूचि पढ़ाई में न हो कर खेल में थी , मै दिन भर बस खेलना पसंद करता था , और मै पढ़ाई में कम और खेल में अधिक रहता था , उसी बिच मेरे स्कूल में एक 400 मीटर रेस का आयोजन हुआ , जिसमे कुल 10 स्कूलो के बच्चे भाग ले रहे थे और मै तो इन्ही सब प्रतियोगिता का इंतिजार करता था , बस फिर क्या था मैंने भी इस प्रतियोगता में नाम लिखा लिया ।


                              क्योकि मै पहले से ही एक हॉकी प्लेयर था,और 03 साल से हॉकी खेल रहा था , जिससे मेरी दौड़ पहले से ही  तैयार थी , पर उसके बाद भी मैंने 1-2 दिन 400 मिटर रेस की तैयारी की , मुझे पूरा विश्वास था की मै ही ये रेस जीतूँगा , और मै इस बात से बहुत खुश था , क्योंकी इससे पहले भी मै स्कूल के छोटे -मोटे प्रतियोगिता में भाग ले चुका था और जीत भी चुका था , मुझे पता था की जीतने पर कितना मज़ा आता है और कितनी ख़ुशी मिलती है , पर ये एक बड़ी प्रतियोगिता थी जिस मे कुल 10 स्कूल के बच्चे भाग लेने वाले थे, और जो भी इस रेस में जीतता उसे इनाम के साथ राज्य स्तर पर भाग लेने का मौका भी मिलता ,और मै इस मौके को किसी भी हालत में खोना नहीं चाहता था ,ये एक प्रकार की कामयाबी की टिकट थी ,



                  फिर क्या था वो दिन आ ही गया जिसका मुझे बेसब्री से इंतजार था , उस दिन उस प्रतियोगिता में कई खेलो का आयोजन होना था , इस लिए मेरी 400 मीटर की रेस शाम को 4 बजे कर दी गयी थी ,और मै 2 बजे ही  मैदान में पहुच गया था और रेस की तईयारी कर रहा था

                  
                    धीरे -धीरे समय बीतता जा रहा था और समय के साथ -साथ मेरे  दिल की दड़कन भी बढ़ती जा रही थी , क्यों की ये रेस मेरे लिए मेरे जीवन की सब से बड़ी रेस थी और सब से बड़ी प्रतियोगिता भी थी, धीरे-धीरे समय बदलता गया और वो पल आ गया जिसका मुझे इंतिजार था , 04 बज गए थे और सभी स्कूलों के बच्चे भी आ गए थे और सभी बच्चे  रेस की तैयारी कर रहे थे , मैने भी रेस की तैयारी शुरू कर दी थी, जैसे-जैसे रेस का  समय नजदीक आ रहा था वैसे-वैसे मेरी सासे और धड़कन बढ़ती जा रही थी और घबराहट सा महसूस हो रहा था,
         

          इसी बिच मैंने देखा मेरे कोच G.P Singh sir मेरी तरफ आ रहे है, उन्होंने मुझे एस्पाइक पहनने को दिया [कटे वाला जूता जिसमे निचे की तरफ कील लगा होता है ] और वो फिर चले गए । मैंने जब स्पाइक पहनना शुरू किया तो मैंने देखा की वहा मुझसे बड़े-बड़े लडके थे जो कक्षा , 10,9 और 8 के थे , मै ये ,देख कर हैरान था और थोड़ा परेशांन भी हो गया था क्योंकी मै उस समय कक्षा 6 में था और मै  इन सब से छोटा था , मुझे लगने लगा की मै तो इन सब से जीत ही नहीं सकता मेरा हारना तो तय है ।मुझे ये बात बाद में पता चली की इस रेस में कक्षा 6 लेकर 10 तक के बच्चे भाग ले सकते थे।
मेरी तो हालत ख़राब हो गयी थी , मैने तो जीतने का सोचना भी छोड़ दिया था , मेरी तो जीतने की उम्मीद ही ख़त्म हो गयी थी , मैँ अब इस रेस में दौड़ना ही नहीं चाहता था , क्यों की मुझे पता था की मै इस रेस में नहीं जीत सकता हू , मेरी सारी जीत की उम्मीद वही ख़त्म हो गयी और मै एक हारे  हुए खिलाडी की तरह मैदान छोड़ कर जाने लगा ।



             तभी मुझे जाता हुआ देख मेरे कोच GP SIR वह आये और उन्होंने मुझसे जाने की वजह पूछी, तो मैंने उन को सारी  बात बता दी , मेरी बाते सुन कर G.P SIR ने कहा कि -  तुम बस पूरी ईमानदारी से दौड़ो जीत और हार अपनी जगह है , और अपनी पूरी शक्ति लगा दो ,और इस रेस को पूरा करो। "क्योंकी डर के आगे जीत"...
       सर के इन  शब्दों ने मेरे अन्दर एक नयी शक्ति का संचार कर दिया । फिर क्या था .... मैंने भी माता रानी का नाम लिया और उस रेस में दौड़ गया ,  और मेरा उस रेस में 2 स्थान आया। . और मुझे स्टेट टीम में चुन लिया गया ,
    उस दिन से ही- मैने ये जाना की दुनिया में कोई भी चीज नामुमकिन नहीं है ,  बस उस काम को करने का हौसला होना चाहिए ॥
   
"क्योकि डर के आगे जीत है "...







                  Comments जरूर करे.. और अपना सुझाव देना न भूले ।

                                           
                                          VICKY TIWARI
       
                                           

Thursday, August 23, 2018

हम क्यों जी रहे है ?

                           क्या हमने कभी अपने आप से ये पुछा है, या यू कह ले कि हमने अपने अन्तर आत्मा से कभी ये पुछा है कि 1-हम क्यों जी रहे है ? ,2-हम किस लिए जी रहे है ?,3-हम किस के लिए जी रहे है ?         

             नमस्कार दोस्तों मै हू विक्की तिवारी आप सभी का स्वागत करता हु , अपने ब्लोग्गर '' मन की बात '' में  

                         


        
            अगर अपने अभी तक अपने आप से ये नही पुछा कि आखिर में हम क्यों जी रहे है , हमारी जीवन का असली मकसद क्या है , तो पूछिये , क्यों की आधे से ज्यादा लोगो को ये पता ही नहीं होगा की आखिर वो क्यों जी रहे है ?
   
           क्योकि हम सब कि  मानसिकता मर चुकी है और हम सब एक घोड़े की तरह हो गए है , जो रेस में दौड़ रहा है और प्रतियोगिता चल रही है और सभी ये सोच रहे है कि एक दूसरे को कैसे हराये और कैसे जीते ,
बस एक पागल घोड़े की तरह भाग रहे है ,,कहा जाना है और किस लिए जा रहे है कुछ नहीं पता , बस भागते जा रहे है पागलो की तरह और इसी तरह एक दूसरे से प्रतियोगिता करते-करते एक दिन मर जायेगे, फिर जितना धन-दौलत इक्कठा किये हो ले जाना अपने साथ , बस हो जायेगा हमारा और तुम्हारा कल्याण ।
         
           कभी -कभी तो लगता है कि हम सभी पैदायसी मूूूूर्ख है, या इस दुनिया ने हमें बना दिया है ,अरे सीधी सी बात है भाई - जो हम सभी को पता है की - जो भी इस दुनिया में आते है , उनके जीवन का कोई न कोई लक्ष्य जरूर होता है, बस इस  बात को समझने की देरी है ,
   तो इसी के साथ - मै  बस यही एक बात कहुगा कि अपने अंदर के कौशल को जाने और उसे बाहर निकाले और हो सके तो गरीबो की और बेजुबान जानवरो की मदत करे ।
                 
    ॥'' क्योकि वो जीना भी क्या जीना जो किसी के काम न आये ॥''
        ॥ '' वो जीवन ही क्या जो वयर्थ चला जाये'' ,॥
                          
                         
                      अगर भूल-चुक कोई गलती हो गयी हो  तो उसे माफ़  करे ॥
                       Comments जरूर करे.. और अपना सुझाव देना न भूले ।

                                                                                                                                  VICKY TIWARI